विचार-मंत्र

बच्चा चोरी का डर बेवजह नहीं, वर्ष 2016 में देशभर से 55,000 बच्चे अगवा हुए

गृह मंत्रालय की ओर से जारी वर्ष 2016 के आंकड़ों को देखते हुए जिनके मुताबिक उस वर्ष भारत से करीब 55,000 बच्चों को अगवा किया गया है और यह आंकड़ा एक वर्ष पहले के आंकड़ों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक है। READ MORE +

हमें जान से प्यारी है जन्मभूमि, एक बार आप भी आइए नॉर्थ ईस्ट

एक बार आइए हमारी धरती पर। हम मिलें न मिले, प्रकृति आपका इतना शानदार स्वागत करेगी की आप जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे। READ MORE +

गंगा दशहरा का आध्यात्मिक,वैज्ञानिक एवं राजनैतिक दृष्टांत

धनलोलुपता में भटकती आत्मा को तारने हेतु धरती पर बह रहीं हैं..और इसको खतरे में बताओ, प्रदूषित बताओ, जहरीली बताओ, तो बड़ा भारी धनकोष गला कर अपनी कई पीढ़ी को तार भी सकते है READ MORE +

सपा अल्पसंख्यकः प्रकोष्ट ने भी अतीक अहमद के समर्थन का किया ऐलान -

इलाहाबाद ---फूल पुर के उप चुनाव की सरगर्मी अब बढ़ने लगी है सभी पार्टियों ने अब चुनाव प्रचार तेज़ करते हुए हर तरह से वोटरों को लुभाना शुरू कर दिया इस चुनाव में अतीक अहमद के खड़े होने से दूसरी सभी पार्टिया ज़्यादा मेहनत करती दिख रही है पिता का चुनाव संभाल रहे अतीक अहमद के बेटे मोहम्मद उमर ने आज फिर फूल पुर संसदीय इलाके में ज़ोरदारप्रचार किया आज उमर और उनके साथियो ने सोराव के मदरसों में नुक्कड़ सभा की सभा में उमर ने लोगो को समझाया की की चाहे समाज वादी पार्टी हो या फिर कांग्रेस मुसलमनो का किसी ने कभी सोचा और यही कारन है की आज भी मुसलमान देश में पिछड़ा हुआ है उमर ने भाजपा नेताओ के इस बयान को भी गलत बताया जिसमे अतीक अहमद के चुनाव लड़ने से भाजपा को फ़ायदा मिलने की बात कही जा रही थी उमर ने कहा की भाजपा के लोग यही भ्र्म फैला कर मुसलमानो की एकता तोड़ने का काम कर रहे है इसलिए किसी को भी इनके बहकावे में नहीं आना चाहिए अतीक अहमद को अपना दल की कृष्णा पटेल का समर्थन मिलने के बाद आज समाजवादी पार्टी अल्पसंख्यकः प्रकोष्ट के प्रदेश महासचिव मोहम्माद साबिर सिद्दीकी ने भी अपना समर्थन अतीक अहमद को देने का ऐलान कर दिया जिससे इस चुनाव में अतीक अहमद की इस्थिति मजबूत होती दिख रही है साबिर सिद्दीकी के इस ऐलान से सपा अल्पसंख्यकः प्रकोष्ट से जुड़े लोग भी अतीक के पक्ष में उतर आये है जिससे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की मुश्किल अब बढ़ने लगी है। और उमर अपने प्रचार में हर जगह लोगो को ये बताते है की समाजवादी पार्टी अब पहले की तरह नहीं है और ये पार्टी मुसलमानो को अपने वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही है। READ MORE +

2019 तैयारी चुनाव की ! बाते जो जीत के लिए रखे ध्यान में !

२०१९ तैयारी चुनाव की ! बाते जो जीत के लिए रखे ध्यान में ! अक्सर चुनावो के परिणाम के बाद ये चर्चा होती है की हमने तो सब कुछ बेहतर किया था या फिर हमारे साथ जनता थी या फिर हम तो चुनाव जीतने वाले थे पर हम चुनाव हार गए ! आखिर ऐसा क्या हुआ जो हम नहीं समझ पाए और चुनाव के पहले तक जो चुनावी परिस्थिति हमें अपने पक्ष में लगती थी वो कैसे हमारे खिलाफ चली गई ? चुनाव ही दुनिया की वो एकमात्र सबसे बड़ी घटना होती है जिसे मात्र मनोवैज्ञानिक या फिर मनोदैहिक मापदंडो पर लड़ा जाता है ! चुनाव में मुख्य उद्देश्य जनता या फिर जनसमूह को मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित करते हुए उन्हें अपने पक्ष में करने की होती है ! मात्र राजनैतिक इवेंट ( रैली,यात्रा इत्यादि ) कर देने से यह निश्चित नहीं होता है कि जनसमूह आपके पक्ष में हो गया है ! साथ ही चुनाव ही एक मात्र ऐसी घटना है जो केवल और केवल मानव के सामाजिक और राजनैतिक व्यवहार पर आलम्बित होती है और जनसमूह का व्यहार सबसे अबूझ पहेली है जिसके बारे में सबसे कम अध्ययन किया गया है या फिर जिसको अभी तक बहुत कम समझा गया है ! आइये यहाँ उन छोटी छोटी बातो की चर्चा करते है जो आपको आगामी चुनाव में माहौल को अपने पक्ष में करने में बहुत सहायक होगी ! १) चुनाव सबसे से अनिश्चित विषय है ! अतः चुनाव का प्रबंधन भी दुनिया में सबसे कठिन कामो में से एक होता है विशेषकर भारत जैसे विविधता से भरे हुए देश में ! चुनाव प्रबंधन अनिश्चितता का प्रबंधन है ! अपनी इसी अनिश्चितता कि प्रकृति की कारण ही बहुत ही अनुभवी नेता या पार्टी भी चुनाव हार जाते है ! अतः इसे गंभीरता से लेना चाहिए भले ही आप कितने अनुभवी और सर्व गुण संपन्न नेता क्यों न हो ! ध्यान रहे कि चुनाव सिर्फ पांच साल में एक बार आता है ! हार गए तो दूसरा मौका पांच साल बाद ही मिलेगा ! २) हारने की स्थिति में ये सिर्फ हार ही नहीं होती है, बल्कि अप्रतक्ष्य रूप में आपको काफी नुकासन होता है ! जैसे की आपका, कार्यकर्ताओ और आपके मतदाताओं का मनोबल टूटना और आपकी छवि आगे के लिए हारे हुए उम्मीदवार के रूप स्थापित होना ! ३) पुनः अपने आपको को जीतने वाले उम्मीदवार के रूप में स्थापित करना बड़ा मुश्किल काम होता है ! जनसमूह को ये पुनः विश्वाश दिलाना काफी कठिन होता है कि हारने के बावजूद भी आप क्यों एक बेहतर उम्मीदवार है ? जनसमूह की मानसिकता को अपने पक्ष में करना काफी मुशिकल होता है ! ४) ज्यादातर हार छोटे छोटे कारणो से होती है या फिर उन चीजों के कारण जिन्हे आप अनदेखा कर देते है ! ५) चुनाव पारितंत्र सबसे गतिमान पारितंत्र होता है ! यहाँ परिवर्तन बहुत तेजी से होता है ! अतः आपका पूरा चुनावी प्रबंधन भी इसी माहौल के हिसाब से गतिशील और तुरंत क्रिया - प्रतिक्रिया देने में सक्षम होना चाहिए ! ६) ध्यान रहे की चुनावी जीत का सबसे प्रमुख पहलू "रणनीति" होती है न की "सोशल मीडिया का प्रबंधन " मात्र इत्यादि ! जीत "सोशल स्ट्रेटेजी" से होती है ! सोशल मीडिया इत्यादि का प्रयोग तभी सफल होता है जब आपकी रणनीति सफल है ! मात्र सोशल मीडिया पर कुछ भी लिख देने या बोल देने,या कोई भी कैंपेन चला देने मात्र से उसका अपेक्षित परिणाम नहीं आता ! अतः सही रणनीति सबसे पहले बनाये ! सोशल मीडिया ,बल्क मैसेज ,ईमेल, वीडियो इत्यादि कंट्रोल्ड तकनिकी है और इन्हे कोई भी प्रयोग कर सकता है ! सारी चुनौती, चुनावी पारितंत्र को समझते हुए सही रणनीति बनाकर पूरे चुनावी पारितंत्र को उचित तरके से अपने पक्ष में मैनेज करने की होती है ! पूरे चुनावी पारितंत्र और उसके डायनामिक्स पर अपना अधिपत्य बनाकर रखना ही एक कुशल रणनीतिकार का अंतिम लक्ष्य या फिर उद्देश्य होता है ! तभी अपेक्षित मतदाता आपसे प्रभावित होकर आपकी तरफ झुकते है ! ७) चुनाव एक नितांत सामाजिक और राजनैतिक प्रक्रिया है जिसमे की मानव / मतदाता और उसका व्यहार ही सबसे महत्वपूर्ण घटक है ! अतः जो भी रणनीति बनाये मतदाताओं के व्यग्तिगत व्यवहार ,समूह का व्यवहार ,अपने विरोधी और पूरे राजनैतिक डायनामिक्स को ध्यान में रख कर बनाये ! अपने आप में चुनावी प्रबंधन एक बहुत की क्लिष्ट और इंटीग्रेटेड प्रक्रिया होती है ! किसी भी चीज को अनदेखा न करे और उसके तह तक माइक्रो लेवल पर जाये ! ७) राजनीती में पोलिटिकल इलुशन और पोलिटिकल मायोपिया से बच कर रहे ! यह एक ऐसा भ्रामक तथ्य है कि हर पार्टी, हर उम्मीदवार अपने आपको जीता हुआ देखता है और हर मतदाता जिससे आप वोट मांगने जाते है वो भी आपको ही वोट देना का वादा करता है जबकि ऐसा ही होगा, ये निश्चित नहीं है ! ८) इस भ्रामक चुनावी पारितंत्र में सही तथ्यों को समझना ही जीत सुनिश्चित कर सकता है अतः उन चीजों पर ध्यान दे जो सामने से आपको नहीं दीखता है, यानि कि लेटेंट पोलिटिकल डायनामिक्स पर ध्यान दे कि कैसे घटनाये एक दूसरे को प्रभावित करती है ! क्या करे कि मतदाताओं का समूह दूसरे उम्मीदवार को छोड़कर आपसे जुड़े ! ध्यान रहे कि समूह गतिकीय ( ग्रुप डायनामिक्स ) कि एक विशेष भूमिका चुनावो में होती है ! ९) अगर आप हारे हुए प्रत्याशी है तो चुनौती इस चीज की है की कैसे जरुरत के मुताबिक अपेक्षित मतदाता की संख्या को अपने पक्ष में करे और अगर आप जीते हुए प्रत्याशी है तो आपके सामने चुनौती ये रहती है की कैसे आप अपने मतदाताओं को अपने पक्ष में कर के रखे ! ध्यान रहे की मतदाताओं का आपसे जुड़ना या जुड़े रहना एक मानव व्यहार का विषय है और मतदाता / मतदाताओं की मनोस्थिति को बदलना एक मुश्किल काम है जिसमे समय लगता है ! १०) मतदाताओं की मनोस्थिति को बदलने के लिए लगातार चरणबद्ध तरीके से काम करने की जरुरत होती है क्योकि ये धीरे धीरे होने वाली प्रक्रिया है ! किसी को कन्विंस करना और अपने पक्ष में करना मुश्किल काम होता है ! ११) जनसमूह की मनोस्थिति को बदलना एक लम्बी प्रक्रिया है ! अतः अभी से काम करना शुरू करे ! ध्यान रखे की दुनिया में कोई भी राजनैतिक परिवर्तन मात्र एक महीने के काम से नहीं हुआ है ! इसके लिए सतत प्रयत्नशील रहना पड़ता है ! १२ ) अभी से अपनी सारी व्यवस्था बना ले,ग्राउंड लेवल रिसर्च कर ले ,वार रूम ,टीम को बनाना उनकी जिम्मेदारियों को बाटना और वो सही तरीके से काम करे इसके लिए लगातार उनको प्रशिक्षण देना अनिवार्य है ! ताकि इलेक्शन कैंपेन के समय आपको अव्यस्था का सामना न करना पड़े ! १३) सारी व्यवस्था और सुविधा होने के वावजूद सफलता इस चीज पर निर्भर करती है की आप "टूल और टेक्निक्स" का धरातल पर कितनी दक्षता से प्रयोग करते है ! अतः आपका एक्सेक्यूशन का प्रोसेस सटीक हो और सटीक समय पर हो इस बात का विशेष ध्यान रखे ! १४) इलेक्शन कैंपेन का उद्देश्य लक्ष्यित जनसमूह को अपने पक्ष में करना होता है ! ध्यान रहे की मात्र कोई पोलिटिकल इवेंट ( जैसे की धरना प्रदर्शन रैली इत्यादि ) कर देने से ये लक्ष्य प्राप्त हो जाये जरुरी नहीं ! अगर जनसम्मोह की मनोस्थिति समजे बिना आप कोई इवेंट करते है तो उसका परिणाम आपके लिए नेगटिव भी जा सकता है ! अतः चुनाव को मात्र एक राजनैतिक इवेंट मैनेजमेंट की तरह न ले ! १५) भीड़ का इक्कठा होने का मतलब आपकी जीत नहीं है ! चुनौती ये होती है की आपकी भीड़, आपके वोट में कन्वर्ट हुई की नहीं ! लगभग सभी दलों के चुनावी रैलियो में भीड़ इकठ्ठा होती है परन्तु जीत उसी की होती है जो इस भीड़ को वोट में कन्वर्ट कर पाता है ! 16) अंत में ध्यान रखे की चुनाव में परिणाम सिर्फ एक ही होता है या तो आप जीतेंगे या फिर हारेंगे ! १ वोट से हार भी आपके सारी मेहनत पर पानी फेर सकता है अतः जरा सी भी चूक की गुंजाइश न रखे नहीं तो दोबारा मौका ५ साल बाद ही मिलेगा ! READ MORE +

2019 - चुनौती चुनाव की !

२०१९ के आम चुनावो में उम्मीदवारों और बिबिन्ह राजनैतिक पार्टियों के सामने आने वाली स्ट्रेटेजिक चुनौतियों की चर्चा कर रहे है ! राजनैतिक दलों,उम्मीदवारों और यहाँ तक कि मतदाताओं के लिए भी २०१९ के चुनाव किसी चुनौती से कम नहीं होने वाले है ! इसी कारन सत्ता पक्ष के साथ साथ विपक्ष और यहाँ तक कि गली और सड़को पैर अभी से २०१९ के चुनावो कि चर्चा सुरु हो गई है ! राजनैतिक दलों,उम्मीदवारों ने भी अभी से अपनी तैयारी शुरू भी कर दी है ! हो भी क्यों न जब आगामी २०१९ के चुनाव अभी तक हुए सभी चुनावो में सबसे ज्यादा क्लिष्ट होने जा रहे हो ! ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्योकि २०१९ एक ऐसा चुनाव होने जा रहा है जहा आधुनिक संचार संसाधनों का सबसे ज्यादा और उन्नत तरीके से प्रयोग सभी के द्वारा किया जायेगा ! आइये देखते है कि राजनैतिक पार्टियों, उमीदवारो और मतदाताओं के लिहाज से क्या क्या चुनौतियां २०१९ के चुनावो में आने वाली है - बात अगर राजनैतिक पार्टियों कि कि जाये तो सबसे महत्वपूर्ण चुनौती सत्तारूढ़ पार्टी बी जे पी को ही है ! जहा बी जे पी के सामने पुनः सर्कार बनाने कि होगी उससे भी बड़ी चुनौती बी जे पी के सामने अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्यों और विपक्ष को एक बार फिर से क्लीन स्वीप करने कि होगी ! अगर ऐसा नहीं हुआ या फिर बी जे पी कि जीत सधारद जीत होती है या फिर अस्पस्ट बहुमत में बी जे पी जोड़ तोड़ से सर्कार बनती है तो ये माना जायेगा कि मोदी लहर कमजोर हो गई है और बी जे पी ने मतदाताओं के मन में जो उम्मीदे २०१४ में जगाई थी मतदाताओं ने उसपर इनके ५ साल के कार्यकाल के बाद भी मुहर नहीं लगाई यानि कि बी जे पी सरकार अपने "वादे, इरादे, और कर के दिखा दे " के सिद्धांत पैर खरी नहीं उतर पाई ! विपक्ष के सामने सब बड़ी चुनौती इस बात कि होगी कि आज कि समाया में बी जे पी जैसे सुसंगठित राजनैतिक दाल का सामना कैसे किया जाये ? क्या विपक्ष एकजुट हो पायेगा ? क्या सारे विपक्षी दल एकजुट हो कर एक मुद्दे पर बी जे पी के साथ लड़ने को तैयार ही पाएंगे ? वैसे देखा जाये तो अभी विपक्ष तीतर बितर है ! और विपक्ष में आम सहमति नहीं बन पाई है ! निस्चय ही विपक्ष अगर अलग अलग लड़ता है तो बी जे पी उनके सामने काफी मजबूत पार्टी रहेगी और जनता के सामने फिर एक बार बी जे पी से केंद्र में सबसे दमदार विकल्प होगी सरकार बनाने के लिए ! कुछ इसी तरह की उहापोह उम्मीदवारो के साथ भी रहेगी ! चाहे बी जे पी हो या फिर और कोई पार्टी के उम्मीदवार,इस बार उम्मीदवारो को व्यक्तिगत रूप से अभी से काफी मेनहत करनी होगी ! मात्रा पार्टी कि लहर के सहारे जीत कि उम्मीद तो शयद ही कोई उम्मीदवार लगा के बैठा हो ! कम से कम बदलते हुए माहौल में सभी उम्मीदवारों ने इस चीज को भाप भी लिया है और इसकी वो तैयारी भी कर रहे है ! ५ साल के शाशन में कोई भी पार्टी आदर्श रूप में अपने "वादे इरादे और कर के दिखा दे" के सिद्धांत पर शाट प्रतिशत सफल नहीं हो पाती है ! इसके कुछ नैसर्गिक कारण भी होते है ! मतदाताओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती इस बात की होगी किस पार्टी को आदर्श रूप में स्वीकार करे और किस पार्टी को नैसर्गिक मजबूरी के रूप में ? मतदाताओं का झुकाव ये बताएगा की क्या मतदाता आदर्श मुद्दों पर झुकते है या फिर उनसे हैट के पुराने चुनावी समीकरण जैसे की जाति पात क्षेत्रीयता आदि मुद्दों पर ! कुल मिलकर मतदाताओं के लिए ये निरयण लेना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी किसे वो वोट दे और स्पस्ट बहुमत की सरकार बनाये या फिर अस्पष्ट जनादेश दे ! इन सबसे ऊपर चुनौती एक चीज की और भी होगी और वो है की चुनावो और राजनीती के कुशल प्रबंधन की ! २०१९ में सोशल मीडिया , इवेंट मैनेजमेंट इत्यादि किसी एक पार्टी की रडनीति मात्रा नहीं रह जाएगी बल्कि असली मुद्दा तो स्ट्रेटेजिक मैनेजमेंट का होगा क्योकि आज सभी पार्टियों ने सोशल मीडिया इत्यादि के लिए पूरी कमर कास ली है जबकि २०१४ के चुनावो में बी जे पी इसमें काफी आगे थी ! देखा जाये तो २०१९ के चुनाव स्ट्रेटेजिक तरीके से बिलकुल ही नए होने वाले है ! जहा एक तरफ साडी पार्टिया मीडिया बोम्बार्डिंग को छोड़कर रडनीतिक पहलु पर ज्यादा ध्यान देगी वही व्यक्तिगत तौर पर उम्मीदवार भी अपनी तरफ से रडनीतिक रूप से काम करेंगे न की मात्र पार्टी की लहर के भरोसे बैठे रहेंगे ! ठीक इसी तरह मतदाताओं के सामने स्पष्ट बहुमत देने की चुनौती रहेगी ! चुनाव भले ही अभी दूर हो पर २०१९ के चुनावी चुनौतियों से निपटने की तैयारी सभी ने अभी से शुरू कर दी है ! READ MORE +

उत्तर प्रदेश उप चुनाव - जीत का गुलाल या हार की कालिख

आगामी दिनों में उत्तर प्रदेश में दो जगहों पर उपचुनाव होने वाले है एक है फूलपुर और दूसरा गोरखपुर ! दूसरी बात ये भी है की कमोबेश इसी वक़्त होली का त्यौहार भी है ! जनता भी इस बार एक हाथ में गुलाल और दूसरे हाथ में कालिख ले के तैयार है ! देखना ये है की किसके मुँह पर जनता जीत का गुलाल और किसके मुँह पर हार की कालिख लगाएगी ! निसंदेह ये चुनाव सत्ता एवं विपक्ष के प्रतिष्ठा का विषय है और हो भी क्यों न ? गोरखपुर जहा वर्त्तमान मुख्यमंत्री श्री योगी जी का गढ़ है वही फूलपुर उपमुख्यमंत्री श्री केशव मौर्या जी का किला है ! निश्चित तौर पर अगर ये दोनों या कोई भी एक सीट बी जे पी के हाथ से निकल जाती है तो साइड तौर पर विपक्षी दाल इसे पुरे सत्ता पक्ष की हार और मोदी लहर की कमजोरी की तरह देखेगी ! जनता में भी यही प्रसारित होना लाजिमी है ! निश्चित तौर पर सत्ता और विपक्ष दोनों ही इन सीटों को हथियाने की पूरी कोशिस करेंगे ! यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी की ये मात्र उप चुनाव नहीं है बल्कि २०१९ में होने वाले चुनावो के परिणामो की भविष्यवाणी है ! जहा विपक्ष मोदी लहर के प्रभाव को कमजोर होता मान रही है और अगर इन चुनावो में समाजवादी या फिर कोई और पार्टी जीतती है तो इतना निश्चित माना जाना चाहिए कि हार कि स्थिति में गुजरात के बाद बी जे पी को यह एक बड़ा सदमा हो सकता है ! इसके साथ साथ श्री योगी और श्री मौर्या के शाशन की कार्य कुशलता का एक मापदंड भी यह साबित होगा ! इन चुनावो के परिणाम ये भी दर्शायेगे की जनता जनार्दन के ऊपर क्या बी जे पी की पकड़ अभी भी बरक़रार है या फिर ढीली हो रही है ! क्योकि २०१९ में संसद का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही गुजरता है जाहिर है की भले ये उप चुनाव हो पर बी जे पी इसे कटाई भी हलके में नहीं लेना चाहेगी ! इसके साथ साथ जनता भी होली के इस त्यौहार को चुनावी गुलाल और कालिख के साथ मनाने को तैयार दिखती है ! देखना ये है की इस बार किसके होली में में गुलाल उड़ेगा और किसके राजनैतिक रंग में भंग पड़ेगा !प्रसिद्ध राजनैतिक रड़नीतिकार श्री एके मिश्रा जी उप चुनावो के महत्व के बारे में बता रहे है READ MORE +

राजनीति का सफल प्रबंधन कैसे करे आप

नेता तुम्ही हो कल के - उभरते हुए राजनैतिक सलाहकार श्री ऐके मिश्रा जी बता रहे है की अपने राजनीति का सफल प्रबंधन कैसे करे आप ? चुनावो में जीतना है तो “नेता नहीं नायक बने प्रत्याशी” - ऐसा मनना है चुनावी और राजनैतिक रणनीति के विशेषज्ञ श्री एके मिश्र जी का ! चुनाव में विजयश्री के रणनैतिक चक्रव्यूह रचने के माहिर श्री मिश्र ने आगे बताते हुए इसके पीछे के छिपे रहस्यो को बताते हुए कहा की भारतीय उपमहाद्वीप के देशो में कुछ हो या न हो पर पर राजनीती की दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है ! कुल मिला कर देखा जाये तो इसी बदलाव की प्रक्रिया को पोलिटिकल ट्रांजीशन फेज कहते है ! इसकी विशेषता होती है इसमें आमूल चूल परिवर्तन आते है ! विगत चुनावो के अप्रत्याशित परिणामो ने भी यही सिद्ध कर दिया है ! परिणामो ने ये सिद्ध कर दिया की एक पार्टी जो किसी जगह बहुत बड़े बहुमत से सरकार बनाती है वही पार्टी दूसरी जगह हार भी जाती है ! चरम पर हर तरीके को इस्तेमाल करने के बाद भी पार्टी या फिर प्रत्याशी हार जाते है ! वही दूसरी जगह कुछ ऐसे भी प्रत्याशी जीतते है जिनके पास न तो किसी पार्टी का सपोर्ट था और न ही सुविधाएं थी ! यानि की घोर विपरीत परिस्थितयो में कुछ लोगो ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया और चुनाव जीते भी ! ऐसा क्यों हो रहा है यही अगर यही समझ लिया जाये तो सर्व कार्य सिद्ध हो जायेगे ! उनका मानना है की जिस तरह से मतदाताओ के राजनैतिक व्यवहार में बदलाव आ रहा है वो इस बात को इंगित करता है की अब जनता का झुकाव नेता की तरफ से हटता जा रहा है ! वो प्रत्याशियों के अंदर मात्रा एक नेता की इमेज की तलाश नहीं करते है बल्कि वो एक ऐसे नायक की तलाश में है जो उनके बीच रहे और दिन प्रतिदिन के संघर्षो में उनका साथ दे ! जो मात्र बयानबाजी न करे बल्कि आगे बढ़ने के मार्ग को स्वयं आगे बढ़कर प्रशस्त करे ! जो दूसरो को रास्ता न दिखाये बल्कि दूसरो के लिए रास्ता बनाये ! जहा पर नेता और जनता के बीच राजनीती और पद का अंतराल न हो बल्कि नेता, नायक की तरह इस तरह से उनके बीच घुला हो जैसे की पानी में शक्कर ! इन बातो से स्पष्ट है की राजनैतिक अनिश्चितता की स्तिथि में आजकल सबसे ज्यादा नेताओ को अपनी राजनैतिक छवि बदलने की है ! पोलिटिकल इमेज बिल्डिंग के विशेषज्ञ श्री एके मिश्र जी ने बताया की आज नेताओ को अगर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है तो अपनी पोलिटिकल ब्रांडिंग और जनता के बीच इमेज रिबिल्डिंग की ! यह कार्य दुष्कर जरूर है पर असंभव नहीं ऐसा मानना है मिश्र जी का ! उनका ये भी कहना है की नेता से नायक बनने की पोलिटिकल इमेज ट्रांसफॉर्मेशन एक लंबी प्रक्रिया है जिसमे की लगातार काम करने की जरुरत है ! इसके फायदे बताए हुए श्री मिश्र ने बताया की एक बार अगर किसी प्रत्याशी ने अपनी पोलिटिकल इमेज को नेता से नायक के रूप में तब्दील कर लिया तो चुनावी परिस्थिति कितनी भी विषम क्यों न हो लेकिन उनके परिणामो के ऊपर फर्क नहीं पड़ने वाला है ! आपको बता दे की श्री ऐके मिश्रा जी भी इलाहबाद के ही रहने वाले है और कई प्रसिद्ध राजनैतिक हस्तियों को अपना मार्ग दर्शन दे चुके है ! READ MORE +

रो-रो फेरी सेवा और परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स पर उसका प्रभाव

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने द्वारा दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी एवं अत्याधुनिक रो-रो परियोजना का उद्घाटन सौराष्ट्र के भावनगर जिले में घोगा से दक्षिण गुजरात में भरूच जिले के दहेज को जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण अध्याय का शुभारंभ हुआ है। READ MORE +