सोच ही नहीं, संवेदनाओं को भी झकझोरता है उपन्यास रूममेट्स

सोच ही नहीं, संवेदनाओं को भी झकझोरता है उपन्यास रूममेट्स

समीक्षक- ओमप्रकाश तिवारी

रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित सीत मिश्र का उपन्यास रूममेट्स एक ऐसी लड़की की कहानी है जो यूपी के एक गांव से देश की राजधानी दिल्ली पहुंचती है और मीडिया के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहती है। गांव से कस्बा फिर शहर और उसके बाद देश की राजधानी तक पहुंचने की कथा पूरी किस्सागोई से कही गई है। केंद्र में लड़की और लड़कियों को लेकर समाज का सोच और उसका नजरिया है। गांव की किसी लड़की का घर से निकलकर किसी विश्वविद्यालय में पढऩे की सोचना अब भी एक दुस्साहस माना जाता है। कुछ हो न हो लेकिन गांव में कहानियां बना दी जाती हैं। इसके बाद नौकरी करना तो और भी कठिन कार्य है। यह पुरुषों के क्षेत्र को चुनौती देना है। उन पुरुषों को, जिनकी मानसिकता औरत को लेकर बहेलिए जैसी है। उनके लिए औरत एक देह है, जो उनके लिए ही बनी है। औरत की सोच उसकी संवेदनाएं और भावनाएं उनके लिए मायने नहीं रखतीं। वे औरत को सर्वशुलभ ही मानकर चलते हैं। औरत की ना उनके अहंकार को चोट पहुंचाती और फिर शुरू होती हैं उनकी सासजिशें। इससे पार पाना हर लड़की या औरत के लिए सुगम नहीं होता। बहेलिए चारों ओर जाल बिछाए बैठे हैं, ऐसे में वह बचकर कहां जा सकती है? 

उपन्यास स्त्री विमर्श के बहुत सारे सवाल उठाता है, लेकिन समाधान प्रदान करने की तरफ नहीं बढ़ पाता। उपन्यास की नायिका तमाम परेशानियों से जूझती उन्हें पार पाती मीडिया में नौकरी भी हासिल कर लेती है, लेकिन यहीं हार जाती है। एक साजिश उसे तबाह कर देती है। नायिका के हश्र से यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या औरत केवल देह है? देह से परे वह इंसान नहीं है? हमारा समाज उसे इंसान क्यों नहीं मानता? देह की सुचिता से स्त्री कब आजाद होगी? यह मानसिकता कब बदलेगी कि सेक्स करने से औरत खत्म नहीं हो जाती। जिस तरह सेक्स करके पुरुष झाड़ पोछकर आगे बढ़ जाता है उसी तरह औरत को भी अधिकार है? वह भी ऐसा कर सकती है? उसे भी ऐसा करना ही चाहिए। सुचिता की अपेक्षा उसी से क्यों? पुरुष कपड़े उतार कर अपना सीना दिखा सकता है और औरत अपने शर्ट का एक बटन भी नहीं खोल सकती? क्यों? 

इस उपन्यास को पढ़ते समय न केवल सोच बल्कि संवेदनाएं भी झकझोर उठती हैं। दिलो-दिमाग बेचैन हो उठता है। लेकिन सवाल उठता है कि फिर स्त्रियां आगे कैसे बढ़ पा रही हैं? कहीं कुछ तो होगा जो औरत के पक्ष में जाता होगा? आज हर क्षेत्र में स्त्रियां अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं परिस्थितियां उनके अनुकूल हैं या बन रही हैं। हालांकि उनकी चुनौतियां कम नहीं हैं। लेकिन यह तो मानव समाज की विसंगतियां हैं। रूढिय़ों में बंधे भारतीय समाज की तो छोडि़ए, विकसित देशों की स्त्रियों का क्या हाल है? यही वजह है कि मुझे उपन्यास की नायिका का संत्रांस में चले जाना अच्छा नहीं लगा। मेरा मानना है कि लेखिका को नायिका को इस चक्रव्यूह से बाहर निकालना चाहिए था। नायिका का हश्र एक तरह से अन्य लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए वर्जित करता है, जोकि कदापि नहीं होना चाहिए। माना कि बहेलियों की संख्या अधिक है, फिर भी उनसे पार पाने के रास्ते हैं। हर दफा शिकारी ही कामयाब नहीं होता। औरत को भी शिकार से शिकारी की भूमिका में आना ही होगा। बिना चुनौतियों के कौन पीछे हटता है या रास्ता देता है? इतना भी निराश नहीं होना चाहिए। उम्मीद एक मुर्दा शब्द है और अंत तक सत्य की जीत नहीं होती है जैसे मुहावरे नहीं गढऩे चाहिए। ऐसे शब्द आत्मघाती होते हैं और खुदकुशी की ओर ले जाते हैं। एक साजिश या एक आरोप से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती है। अंत में सत्य की जीत हो न हो लेकिन उम्मीद एक जिंदा शब्द है। हां, आदमी को धर्म से परे होना चाहिए। ईश्वर नहीं है इसलिए वह किसी की मदद नहीं कर सकता, यह एक सत्य है। कुलमिलाकर रूममेट्स एक अच्छा उपन्यास है। इसमें बौद्धिकता की जुगाली नहीं है। सीधी और सरल भाषा में बिना लाग-लपेट के अपनी बात कही गई है। केवल नायिका अंत निराश करता है। यह हमारे समाज का सत्य है, लेकिन सृजन नैराश्य से परे होना चाहिए।